राजगढ़ पैलेस की मिट्टी में दबा था सोने का सच!बिना खुदाई सड़क किनारे कैसे निकले मालवा के सिक्के?

बालकिशन विश्वकर्मा | राजनगर (खजुराहो)
खजुराहो के समीप स्थित ऐतिहासिक राजगढ़ गांव में इन दिनों जो हो रहा है, वह सिर्फ “खजाने की अफवाह” नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संभावित गड़बड़ी की ओर इशारा करता है। ओबेरॉय ग्रुप द्वारा लीज पर लिए गए ऐतिहासिक राजगढ़ पैलेस परिसर में चल रहे निर्माण कार्य से निकली मिट्टी में सोने जैसे सिक्के मिलने की खबरों ने पूरे जिले को हिला दिया है।
सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह है कि जब सड़क किनारे कहीं कोई खुदाई नहीं हुई, तो फिर वहां से सोने के सिक्के आखिर आए कहां से?
निर्माण स्थल से सड़क तक ‘सोने का सफर’
सूत्रों के अनुसार, पैलेस परिसर में स्टाफ क्वार्टर निर्माण के दौरान निकाली गई मिट्टी को 22 जनवरी को महल से लगभग 300 मीटर दूर सड़क किनारे डंप किया गया था। इसके बाद हुई बारिश ने जैसे मिट्टी के नीचे छिपा इतिहास उघाड़ दिया।
ग्रामीणों और सरपंच का दावा है कि इसी मिट्टी से 10 से 12 लोगों को सोने जैसे सिक्के मिले। यह सिक्के करीब 500 साल पुराने हो सकते हैं, ऐसा भी कहा जा रहा है।
सड़क बनी खुदाई स्थल, प्रशासन नदारद
मौके पर स्थिति किसी मेले या आंदोलन जैसी नहीं, बल्कि खुलेआम चल रहे अवैध उत्खनन जैसी दिखी।
50 से 70 ग्रामीण सड़क किनारे पड़ी मिट्टी को गैंती-फावड़ों से खोदते नजर आए। महिलाएं और बच्चे तक छलनियों से मिट्टी छानते दिखे।
इतनी बड़ी हलचल के बावजूद न तो पुलिस ने क्षेत्र सील किया, न ही प्रशासन ने तत्काल हस्तक्षेप किया। सवाल उठता है—
👉 क्या जिम्मेदारों को समय रहते जानकारी नहीं थी?
👉 या जानकारी होते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?
गरीबों की उम्मीद बन गया सिक्का
स्थानीय निवासी राधा अहिरवार बताती हैं कि उनकी पांच साल की नातिन सुहानी को मिट्टी छानते वक्त एक सिक्का मिला, लेकिन छीना-झपटी में वह हाथ से निकल गया।
कर्ज में डूबे परिवार के लिए वह सिक्का सिर्फ धातु नहीं, बल्कि जिंदगी बदलने की आस था।
यह दृश्य बताता है कि यह मामला सिर्फ पुरातत्व का नहीं, बल्कि सामाजिक त्रासदी का भी है।
बच्चे भी ‘खजाना खोजी’, रात में मिलने की चर्चा
पांचवीं कक्षा का छात्र पवन लोहे की रॉड से जमीन कुरेदता मिला। उसने कहा—
“हम खजाना ढूंढ रहे हैं, सुना है रात में लोगों को सोना मिला है।”
रात में सिक्के मिलने की चर्चा ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
10 से 40 सिक्कों तक की चर्चा, उर्दू-अरबी जैसी लिखावट
ग्राम पंचायत सरपंच रमेश प्रसाद बिल्ला का कहना है कि बारिश के बाद मिट्टी धुलने पर दबे सिक्के नजर आने लगे।
ग्रामीणों में चर्चा है कि किसी को 10 तो किसी को 40 तक सिक्के मिले हैं। कुछ सिक्कों पर उर्दू या अरबी जैसी लिखावट होने का दावा भी किया जा रहा है।
यह स्थिति सीधे-सीधे पुरातात्विक संपदा की लूट की आशंका पैदा करती है।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें, लेकिन सरकारी कब्जे में एक भी सिक्का नहीं
सोशल मीडिया पर सिक्कों की तस्वीरें वायरल हो चुकी हैं। ग्रामीणों का दावा है कि प्रत्येक सिक्का 7–8 ग्राम का है।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब तक पुलिस या प्रशासन के पास एक भी सिक्का जमा नहीं हुआ।
यदि सिक्के असली नहीं हैं, तो तस्वीरें कहां से आईं?
और यदि असली हैं, तो अब तक जब्ती क्यों नहीं?
350 साल पुराना बुंदेला इतिहास, खजाने की पृष्ठभूमि
राजगढ़ गांव बुंदेला राजवंश के करीब 350 वर्ष पुराने महल के लिए जाना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार यह इलाका कभी समृद्ध व्यापारिक नगर था, जहां ‘सात झंडे का बाजार’ लगता था।
समाजसेवी राकेश कुशवाहा का मानना है कि किसी महामारी या आपदा के दौरान लोग अचानक पलायन कर गए और अपना धन जमीन में ही दबा रह गया — जो अब निर्माण और बारिश से बाहर आने लगा है।
पुलिस का दावा बनाम जमीनी हकीकत
एसएसआई दीक्षांत चावरे कहते हैं कि पुलिस को अब तक कोई सिक्का नहीं मिला है और मिलने पर जांच की जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि
👉 जब पूरा गांव खुदाई में जुटा था,
👉 तस्वीरें वायरल हैं,
👉 और सरपंच खुद सिक्के मिलने की बात कह रहे हैं,
तो फिर पुलिस के हाथ खाली कैसे हैं?
फ्रंट पेज सवाल
❗ क्या यह बुंदेला कालीन खजाना है?
❗ क्या निर्माण कार्य के दौरान नियमों की अनदेखी हुई?
❗ क्या साक्ष्य खत्म करने में देरी जानबूझकर की गई?
❗ और क्या यह मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
राजगढ़ की मिट्टी ने सच उगला है…
अब जवाब देने की बारी प्रशासन की है।

Post a Comment

Previous Post Next Post